मुंबई, 21 नवंबर:
कम बजट, बिना बड़े नाम, बिना आक्रामक मार्केटिंग—फिर भी ‘बिसाही’ आज वह कर दिखा रही है जो अक्सर बड़े-बड़े बजट की फिल्में भी नहीं कर पातीं।
सिर्फ कंटेंट और दर्शकों के प्यार की ताकत पर ‘बिसाही’ ने सिनेमाघरों में सफलतापूर्वक 50 दिन पूरे कर लिए हैं और अपने 9वें सप्ताह में भी चुनिंदा सिनेमाघरों में मजबूत पकड़ बनाए हुए है।
निर्माता नरेंद्र पटेल और लेखक-निर्देशक अभिनव ठाकुर की यह फिल्म उस क्रूर हकीकत को सामने लाती है जिसमें आज भी देश के कई हिस्सों में महिलाओं को “डायन-बिसाही” घोषित कर उनकी जिंदगी नर्क बना दी जाती है।
सच्ची घटनाओं पर आधारित यह मनोवैज्ञानिक-सामाजिक थ्रिलर सिर्फ एक फिल्म नहीं — एक प्रतिरोध है।
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कहानी जो भीतर तक चोट करती है
फिल्म की नायिका स्तुति (पूजा अग्रवाल) एक निडर व्लॉगर है, जिसकी कैमरे की रोशनी उस अँधेरे को उजागर करना चाहती है जहाँ इंसानों से ज्यादा अंधविश्वास हुकूमत करता है।
साधारण डॉक्यूमेंटेशन से शुरू हुई उसकी यात्रा एक लड़ाई बन जाती है—अन्याय और हिंसा के खिलाफ।
रवि साह, इंदु प्रसाद और रामसुजन सिंह के प्रभावशाली अभिनय ने इस कहानी को दिलों तक पहुँचा दिया है। उनके परफॉर्मेंस ने फिल्म को दस्तावेज़ से आगे एक भावनात्मक चोट में बदल दिया है।
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दर्शकों और संस्थाओं की ऐतिहासिक प्रतिक्रिया
‘बिसाही’ को बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम, पंजाब, दिल्ली और महाराष्ट्र में अद्भुत रिस्पॉन्स मिला है।
फिल्म को सिर्फ देखा नहीं गया — इसे महसूस किया गया, चर्चा की गई और अपनाया गया।
कई NGO, सामाजिक संगठन, विश्वविद्यालयों और महिला सुरक्षा समूहों ने इसे जागरूकता अभियानों में शामिल किया है।
बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड सरकार के सामाजिक न्याय एवं महिला कल्याण विभागों ने फिल्म की साहसिक प्रस्तुति और सामाजिक प्रभाव की खुले तौर पर सराहना की है।
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निर्माता एवं निर्देशक की प्रतिक्रिया
निर्माता नरेंद्र पटेल:
“‘बिसाही’ यह साबित करती है कि जब कहानी सच्ची हो और नीयत ईमानदार, तो दर्शक उसे अपना लेते हैं। यह फिल्म बदलाव की पहल है, और यह शुरुआत भर है।”
लेखक-निर्देशक अभिनव ठाकुर:
“यह फिल्म उन चीखों की आवाज़ है जिन्हें वर्षों तक दबाया गया।
‘बिसाही’ दर्द, साहस और सच्चाई की वह यात्रा है जो आज भी जारी है।
दर्शकों का यह समर्थन हम सभी की जीत है — सिनेमा की, समाज की, इंसानियत की।”
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सच्चे सिनेमा की ऐतिहासिक जीत
शानदार IMDb रेटिंग्स, आउटस्टैंडिंग वर्ड ऑफ माउथ और लगातार बढ़ते दर्शकों के समर्थन ने ‘बिसाही’ को एक सिनेमा मूवमेंट में बदल दिया है।
यह सिर्फ पर्दे पर नहीं—विचारों, बहसों और बदलाव की मांग में जिंदा है।
‘बिसाही’ याद दिलाती है:
जब सिनेमा सच बोलता है—तो उसकी गूँज समाज को झकझोर देती है।
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अब भी चुनिंदा सिनेमाघरों में
Running Successfully in Its 10th Week
